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दरभंगाबिहार

विज्ञान के बिना दुनिया में कुछ भी करना मुश्किल : प्रो. बीएस झा

विज्ञान के बिना दुनिया में कुछ भी करना मुश्किल : प्रो. बीएस झा


ज्ञान के बिना दुनिया में कुछ भी करना मुश्किल : प्रो. बीएस झा

  • भारत के आर्थिक विकास में विज्ञान का अतुलनीय योगदान
  • भारत के स्वास्थ्य विभाग को सुदृढ़ करने में आइसीएमआर ने निभाई अहम भूमिका : डॉ. अजय कुमार
  • सीएम साइंस कॉलेज में आयोजित विज्ञान सप्ताह के दूसरे दिन वक्ताओं ने रखे अनमोल विचार

दरभंगा। विज्ञान के बिना दुनिया में कुछ भी करना मुश्किल है। विकसित देशों ने विज्ञान के क्षेत्र में अतुलनीय कार्य करके ही तरक्की हासिल की है। किसी भी देश के आर्थिक विकास में विज्ञान ने अहम भूमिका निभाई है।

उक्त बातें बुधवार को भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय और संस्कृति मंत्रालय के नेतृत्व में विज्ञान प्रसार विभाग की ओर से सीएम साइंस कॉलेज में आयोजित विज्ञान सप्ताह के दूसरे दिन परिचय ‘विज्ञान सर्वत्र पूज्यते’ विषय पर सेमिनार को संबोधित करते हुए ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के साइंस डीन प्रो. बीएस झा ने कहीं। प्रो. झा ने कहा कि भारत के आर्थिक सुधार में विज्ञान अहम किरदार निभा सकते हैं।

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भारत सरकार ने इसकी महत्ता को जानते हुए एक दिवसीय विज्ञान दिवस को इस बार देश भर की 75 जगहों पर विज्ञान सप्ताह मनाने का निर्णय लिया है। विज्ञान सप्ताह के माध्यम से सरकार जानना चाहती है कि देश भर में कौन सी नई खोज हो रही है और भविष्य में शोध के लिए क्या रोडमैप होना चाहिए। साथ ही मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत के लिए एक दिशा तय करेगा।

प्रो. झा ने कहा कि सरकार इस विज्ञान महोत्सव के माध्यम से नई पीढ़ी को आजादी के बाद भारत में हुए अनुसंधान से अवगत कराना चाहती है। विज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने की जरूरत है। अभी लोगों में समर्पण का आभाव दिख रहा है। देश और बिहार में प्रतिभा की कमी नहीं है, इस पर विचार करने की जरूरत है। साथ ही कहा कि होम्योपैथिक में पारंपरिक खोज की आश्यकता है।

आइसीएमआर के वैज्ञानिक डॉ. अजय कुमार ने स्वास्थ्य विभाग में आइसीएमआर की महत्ता विषय पर आयोजित सेमिनार को संबोधित करते हुए कहा कि आइसीएमआर ने भारत के स्वास्थ्य विभाग को सुदृढ़ करने में आइसीएमआर ने अहम भूमिका निभाई है। भारत से कालाजार, मलेरिया, आयोडिन की कमी, पोलियो और बीमारियों की खत्मा के लिए आईसीएमआर ने दवाइयों की खोज करने में कामयाबी हासिल की है।

यहां तक की कोरोना जैसी महामारी में कोरोना वैक्सीन के प्रबंधन की जिम्मेदारी आइसीएमआर के पास ही सरकार दी हुई है। आईसीएमआर सौ साल पुरानी संस्था है। अब आईसीएमआर ने पटना में भी संस्थान का निर्माण किया है। इसके अलावा ‘भारतीय विज्ञानक क्रमिक इतिहास पर आधारित वृतचित्र के प्रदर्शन’ विषय पर नई दिल्ली से वक्ताओं ने वर्चुअल मोड में सेमिनार को संबोधित किया।

इससे पहले विज्ञान सप्ताह आयोजन समिति के अध्यक्ष प्रो. दिलीप कुमार चौधरी ने अतिथि वक्ताओँ का स्वागत करते हुए विज्ञान सप्ताह के आयोजन की रूपरेखा पर प्रकाश डाला। उन्होंने लगातार सात दिन तक चलने वाले इस देश व्यापी कार्यक्रम से लोगों को अवगत कराया। साथ ही विज्ञान सप्ताह में शामिल होने वाले वैज्ञानिकों की भी जानकारी सभी से साझा की। अपने संबोधन में उन्होंने विज्ञान सप्ताह महोत्सव में भाग लेने वाले अतिथियों, शोधार्थियों एवं विभिन्न प्रतिभागियों के प्रति आभार जताया।

वहीं ‘विज्ञान क्विज प्रतियोगिता’ में डब्ल्यूआईटी, सीएम साइंस कॉलेज, सीएम कॉलेज, एमएलएसएम कॉलेज, एलसीएस कॉलेज सहित अन्य कॉलेजों एवं विद्यालयों के प्रतिभागियों ने भाग लिया। प्रतियोगिता में सफल हुए प्रतिभागियों को 28 फरवरी को सम्मानित किया जायेगा। कार्यक्रम के दूसरे सत्र में स्थानीय कलाकारों की ओर से लोगों में विज्ञान के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए नुक्कड़ नाटक का मंथन किया गया, जिसका सभी ने जमकर लुफ्त उठाया।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मन्त्रालय के स्वायत्त संस्थान विज्ञान प्रसार द्वारा संचालित ‘इंडिया साइंस’ चैनल के संपादक मानवर्धन कंठ ने बताया कि विज्ञान सप्ताह महोत्सव के तीसरे दिन ‘मिथिलाक सांस्कृतिक परंपरा में विज्ञान’, ‘प्राचीन भारत में मौसम विज्ञान’, ‘वैदिक वाड्मय में विज्ञान’, ‘आधुनिक भारतीय विज्ञान ओ तकनीकी मीलक पत्थर’ विषय पर सेमिनार का आयोजन किया जायेगा।

इसके अलावा ‘निबंध लेखन प्रतियोगिता’ और ‘विज्ञान लघु नाटिका’ का भी आयोजन होगा। विज्ञान सप्ताह के दूसरे दिन कार्यक्रम का मंच संचालन डॉ. सत्येंद्र कुमार झा और डॉ. नेहा वर्मा ने मिलकर किया।

सेमिनार में डॉ. दिलीप कुमार झा, डॉ. दिनेश प्रसाद साह, डॉ. कुमार मनीष, डॉ. सुजीत कुमार चौधरी, डॉ. संजीत कुमार झा सरस, डॉ. रूपेंद्र झा, डॉ. पांशु प्रतीक, डॉ. आरती कुमारी, डॉ. पूजा अग्रहरि, डॉ. निधि झा, डॉ. रश्मि रेखा, डॉ. अभय सिंह और छात्र-छात्राएं मौजूद थे। तकनीकी सहायक के रूप में गणेश पासवान और केशव कुमार झा की उल्लेखनीय भूमिका रही।


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